जब मैं अपने विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रहा होता हूँ |

जो आनंद एक किसान को अपनी लह-लहाती फसल को देखकर आता है, व्यापारी को अपना व्यापार फलित होते हुए देखकर आता है, माता-पिता को अपनी संतान को सफल होते हुए देखकर आता है|उसी आनंद की अनुभूति मुझे तब होती है, जब मैं अपने विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रहा होता हूँ | क्योंकि शिक्षा अर्थात् ज्ञान ही इस संसार में सुख का आधार है | बिना ज्ञान के साधन होते हुए भी हम सुख प्राप्त नही कर सकते | जिस प्रकार Aeroplane होते हुए भी यदि उसे चलाने का ज्ञान नही है तो हमें क्या लाभ | इसलिए समाज व देश के लिए ज्ञानदाता शिक्षक की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं|

 मुझे चाहे विद्यार्थियों से आदर मिले या ना मिले, हर-हाल में मेरा कर्त्तव्य है, कि  मैं अपने ज्ञान और शक्ति के अनुसार अधिक से अधिक प्रभावशाली शिक्षा प्रदान कर, अधिक से अधिक जिम्मेदार नागरिक तैयार करके देश व समाज की सेवा में रत रहूँ|  एक आदर्श शिक्षक को विद्यार्थियों में भेद ना करते हुए, अपना पराया ना देखते हुए, अधिक से अधिक ज्ञान प्रदान कर परोपकार अवश्य करना चाहिए –
 कहा गया है –
              अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयं |
              परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीडनम् |
- Naveen Sharma, The Iconic School
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