मनमानवेंद्र: एक बुद्धिमत्ता दिल की और एक बुद्धिमत्ता दिमाग की


एक  बुद्धिमत्ता  दिल  की और एक बुद्धिमत्ता  दिमाग की, दोनों के अपने- अपने मायने है और दोनों का असल जिंदगी में बहुत महत्व है,क्योंकि दिल हमें रिश्ते मजबूत करना सिखाता है और दिमाग उन रिश्तों को बनाए रखना सिखाता है। 
दिल और दिमाग चाहे शरीर के अलग-अलग स्थान  पर है लेकिन दोनों ही हमें फैसला लेने में मदद करते हैं वैसे तो हम हमेशा अपनी दिमाग की सुनते है लेकिन हमें तनाव या दुख हो तो दिल ही वह काम करता जो दिमाग नहीं कर सकता और उस तनाव से हमें दिल ही बाहर निकलता है। कबीर दास जी ने कहा है कि "पोथी पढ़ी -पढ़ी जग मुआ पंडित भया कोई। ढाई अक्षर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय यानी  कि चाहे कितनी भी पुस्तकें आदि पढ़ लो लेकिन जब तक प्रेम से काम नहीं लेंगे वास्तविक विद्वान नहीं बन सकते। मेरे विचार  किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं है बल्कि जो सच्चाई है और दोनों का जो महत्त्व होता है वह बता रहा हूँ। 
सभी जीवो से इंसान आज बहुत आगे है क्योंकि इंसान के पास दिमाग (विकसित) है अन्यथा दिल तो सभी जीवों के पास है। वहीं दूसरी तरफ अगर देखे तो दिल का भी उतना  महत्त्व है जितना कि दिमाग का,क्योंकि इंसान बुद्धिहीन दिमाग से तो जिंदा रह सकता है लेकिन बिना दिल के इंसान एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता। इसलिए दोनों अपनी -अपनी जगह पर ठीक है और मेरा मानना है कि जब भी कोई तनाव -पूर्ण स्थिति में फैसला लेना हो तो हमेशा दिमाग की सुनें और जहाँ स्थिति  रिश्तों की हो वहाँ अपने दिल की सुनो तभी हम सही मायनों में कोई सही फैसला ले पाएँगे। 
लेकिन लोगों का मानना है कि दिमाग ऊपर स्थित है और इसलिए हमेशा दिमाग की सुननी चाहिए कि दिल की ताकि हम भावनात्मक होकर फैसला ले सकें लेकिन मेरे विचार लोगों के विचारों से विपरीत है क्योंकि कभी -कभी रिश्तों की गरिमा बनाए रखने के लिए दिल से भी फैसला लेना पड़ता है। 
उदाहरण के तौर पर देखे तो एक खिलाडी के जीवन में फिटनेस बहुत जरूरी है लेकिन कभी-कभी उसका दिल ऐसी चीजें खाने का करता जो उसके सेहत के लिए सही नहीं है और उस समय उसका दिमाग उसे रोकता है और कहता है यह सही नहीं तो कहने का अर्थ है दोनों ही दिल और दिमाग कुछ भी फैसला लेने में बहुत मदद करते है और एक तरफ से हमारा दिमाग दिल के अनुरूप काम करता है। लेकिन जब हम सिर्फ एक की ही सुनते हैं या तो दिल की या दिमाग की तब वहाँ हमारा लिया हुआ फैसला गलत भी हो सकता और इसलिए हमें हमेशा दोनों की सुननी चाहिए और फिर फैसला लेना चाहिए और तभी हम यह कह सकते है कि "एक बुद्धिमत्ता दिल की और एक बुद्धिमत्ता  दिमाग की
                                                                        मनमानवेंद्र सिंह /कक्षा 12 - The Fabindia School
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