Kalpana Jain: हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी


आपने बचपन में कागज़ के हवाईजहाज़ जरूर बनाए होंगे और उन्हें उड़ाया भी होगा। विद्यालय में भी कुछ शरारती बच्चे कक्षा में कागज़ के हवाईजहाज़ बनाकर उड़ाते हैं। वही शरारती बच्चे अब बड़े हो गए हैं और अब वे संविधान के मंदिर में हवाईजहाज़ उड़ाते हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई एक-दूसरे को चोर ठहराते हैं। उनके पास कई बॉटल हैं और उनमें बंद कई जिन्न!! जिन्हें मौकापरस्त लोग अपना मतलब निकालने के लिए बाहर निकालते हैं। कुछ साल पहले बोफ़ोर्स का जिन्न निकला था और कई लोगों को ले डूबा था। आज-कल राफेल का जिन्न हल्ला मचा रहा है। जो कुछ राज्यों की सरकारों को ले डूबा है। ऐसा लगता है!! कुछ लोगों को ऐसा भ्रम है!
आपने एक गड़रिये की कहानी सुनी है? जिसमें वह रोज अपनी भेड़ों को चराने जंगल जाता था और वहाँ पर शेर आया.........शेर आया- चिल्लाता था। गाँववाले भागकर उसकी मदद करने आते। उन्हें देखकर वह जोर-जोर से हँसता और कहता अच्छा बुद्धू बनाया। एक रोज सचमुच शेर आ गया। वह अपनी जान बचाने के लिए जोर-जोर से चिल्लाया पर कोई भी मदद के लिए नहीं आया। आजकल एक पप्पू रोज राफेल-राफेल चिल्ला रहा है। कुछ भोले-भाले लोग बार-बार दौड़कर उसकी मदद को आ रहे हैं। 
विरोधी पक्ष भी पीछे नहीं है। कभी वह विदेशी मामा को खोज लाते हैं, तो कभी अन्य गड़े मुर्दे उखाड़ने लगते हैं। असल बात तो यह है कि सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। अवसरवादिता इन सब पर इस कदर हावी है कि घात लगते ही नीचा दिखाने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। इनकी तह में जाओ तो सब एक ही डोरी में गुंथे हुए हैं। जिनका एक ही उद्देश्य है, जैसे भी हो अपने छोटे-छोटे व्यक्तिगत हितों के लिए दूसरों के भविष्य को दाँव पर लगा दो। इनके सफेद कपड़ों के अंदर जमाने भर की कालिख छिपी हुई है। सबसे बड़े दुख की बात तो यह है कि ये सारा घालमेल देश के रक्षा सौदों में सालों से हो रहा है। देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए अमर्यादित, अभद्र भाषा का प्रयोग, संविधान के मंदिर में रोज हंगामा खड़ा करना इनकी आदत हो गई है। 
कभी आपने सोचा है...किन लोगों के हाथ में हमने अपना भविष्य सौंप दिया है? हम सब इनके हाथ की कठपुतली बन गए हैं, जिन्हें वोट की ताल पर नचाया जा रहा है। अंधभक्तों की फ़ौज इनके पीछे है, जो इनके एक इशारे पर मर-मिटने और मरने-मारने को तैयार है। ज़रा सोचिए...किस खतरनाक मोड़ पर ले आये हैं हम, अपने साथ अपने देश को?
आज जब मैं यह लिख रहीं हूँ तो मुझे राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त बहुत याद आ रहे हैं। शायद वे भविष्यदृष्टा रहे होंगे तभी तो कई साल पहले कह गए– "हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी। आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।"

-कल्पना जैन, The Iconic School, Bhopal

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