Caring Icons: सहानुभूति एक महान कक्षा संस्कृति का दिल है।

सीखना एक कौशल है। एक ऐसा कौशल जो समय के साथ त्रुटियों और प्रयासों से पाया जा सकता है। स्वयं को समय के प्रति समर्पित करके, गल्तियों को स्वीकार करके, ठोकर खाकर, गिरकर और संभलकर आगे बढ़ने पर ही लक्ष्य को पाने में कामयाबी मिलती है। यह बात भाषा शिक्षण की कक्षा में पूरी तरह लागू होती है।  मान लीजिए कि हम एक भाषा सीख रहे हैं, तो इसके लिए चयनित सामग्री का सही तरीके से उपयोग कारगर सिद्ध होता है।

प्रायः छात्र भाषा सीखने में असहज महसूस करते हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि उन्हें भाषा से संबंधित व्यवहारिक ज्ञान देने के बजाय नियम और निर्देश दिए जाते हैं। जो विषय रोचकपूर्ण ढंग से अभ्यास द्वारा आसानी से सीखा जा सकता है। उसे नियमों और सिद्धांतों में बाँधकर जटिल, बोझिल और नीरस बना दिया जाता है। यही बात अन्य विषयों के बारे में भी कही जा सकती है। इससे बच्चे सीखने के लिए अग्रसर न होकर, उकताकर हतोत्साहित और निराश हो जाते हैं और उनमें सीखने से विरक्ति हो जाती है।

याद कीजिए, किस प्रकार एक छोटे बच्चे को उसकी प्रारंभिक कक्षा में सबसे पहले उसके आसपास के लोगों, चीज़ों और दृश्यों से जुड़ी कविताएँ गाकर सिखाई जाती हैं, ताकि वे उनसे जुड़ाव महसूस करें। लय और ताल उनमें एक गति लाता है। अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति से वे उसे प्रभावी बनाते हैं। नन्हें-मुन्ने बच्चे दुनिया की उलझनों से अनजान होते हैं। उनमें सहज ग्राह्यता होती है। जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं, उनका दायरा बढ़ता जाता है। बुरे अनुभव उनकी क्षमता को प्रभावित करने लगते हैं।

आजकल लोग भाषा को स्टेटस सिंबल की तरह प्रयोग करते हैं।  एक भाषा को श्रेष्ठ और अन्य को उससे कम समझना भी सीखने को प्रभावित करता है। यह स्थिति किशोर छात्रों में प्रायः देखी जाती है। ऐसे में शिक्षक की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। एक शिक्षक आकर्षक व्यक्तित्व और बेहतर शिक्षण कौशल के साथ हर प्रकार के छात्र का ध्यान खींचने में सफल हो सकता है। जिस प्रकार एक कुम्हार घड़े को बनाने के लिए मिट्टी को आवश्यकतानुसार गीला करता है। घड़े को बनाते समय अंदर से वह एक हाथ से प्रेमपूर्वक धैर्य और कुशलता से उसे सहारा देता है और दूसरे हाथ से वह धीरे-धीरे लगातार चोट करता रहता है। कच्चे घड़े को वह तब तक संभाले रखता है, जब तक आग की तेज़ आँच में पककर वह इस्तेमाल के लिए तैयार न हो जाए, एक शिक्षक भी कुम्हार की तरह होता है, एक ओर वह प्रेम, धैर्य और सहानुभूति से छात्रों को भावनात्मक संबल देता है तो दूसरी ओर अनुशासन से उसे एक सुयोग्य नागरिक के रूप में स्थापित करता है। कक्षा के प्रतिभाशाली,कमजोर और औसत छात्रों के लिए बनाई गई कार्ययोजनाओं एवं अभ्यास के स्पष्ट उद्देश्यों से वह छात्रों को सीखने के लिए प्रोत्साहित करके  सफल हो सकता है। वास्तव में  “सहानुभूति एक महान कक्षा संस्कृति का दिल है।

- CARING ICONS, The Iconic School Bhopal

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