Wednesday, June 24, 2020

स्वतंत्रता और शान्ति: उषा पंवार

देश की आजादी से ही देश के हर नागरिक के आजादी जुड़ी है। आजादी का अर्थ मनमानी करने की छूट नहीं है बल्कि इसका अर्थ है कि नियम-कायदों की सीमा में रहते हुए व्यक्ति सही ढंग से अपने कर्तव्यों की पालना करें, अपनी सीमा में रहे और दूसरों को कष्ट ना हो। 8 से 9 साल के बाद बच्चों को आजादी देनी चाहिए कि वह अपने बारे में छोटे-छोटे निर्णय ले सके, जैसे कि उन्हें खेल खेलने जाना है, क्या पहनना है, कितनी देर पढ़ाई करनी है या कितनी देर टीवी देखना है। यानी इस उम्र से ही उन पर कुछ जिम्मेदारी डालनी चाहिए क्योंकि एक बार युवावस्था में पहुँचने के बाद तो वह वैसे भी मनमानी करते हैं।

बड़ों को बच्चों की उम्र के अनुसार उनपर विश्वास करना चाहिए। कुछ बातों का निर्णय उन पर छोड़ देना चाहिए। माता पिता को अपनी पसंद थोपनी नहीं चाहिए बल्कि उसे निर्णय लेने में मदद करनी चाहिए। ऐसे में उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और ज्यादा आत्मनिर्भर बनेंगे। बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी बात को ध्यान से सुनना चाहिए। बच्चे को आगे क्या करना है, इसका निर्णय अभिभावक को नहीं बल्कि बच्चों को ही करना चाहिए, 12वीं के बाद बच्चे इतने सयाने हो जाते हैं कि वे अपना कैरियर खुद चुन सकते हैं। बच्चों को उस समय मार्गदर्शन व सहयोग की आवश्यकता होती है जब वह अपनी पसंद की पढ़ाई करेंगे तो बेहतर परिणाम मिलेगा।

बच्चे मन के सच्चे होते हैं, इनका मन कोरे कागज की तरह होता है। बच्चों को बोलने की, खेलने की, पढ़ने की पूरी आजादी दे दो, बच्चों में निश्चित रूप से विकास होगा। बच्चों को खेल खेल में शिक्षित, गुणवान बनाकर उनका सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। हमें बच्चों की भावनाओं का भी ध्यान रखना रखना चाहिए। छोटा बच्चा समझकर उनके निर्णय को टालना नहीं चाहिए। माता-पिता व शिक्षकों को बच्चों की रूचि का ख्याल रखना चाहिए। माता पिता को बच्चों पर पूरा भरोसा विश्वास करते हुए, उन्हें आजादी के साथ जिम्मेदारी का एहसास दिलाना चाहिए। जिन बच्चों पर ज्यादा प्रतिबंध लगाए जाते हैं वही चोरी-छिपे आजादी का गलत इस्तेमाल करते हैं।

बच्चे की वास्तविक प्रतिभा पहचानने और निखारने की शिक्षा का उद्देश्य आजादी देना जरूरी है। माता पिता और अध्यापक को ध्यान रखना है कि बच्चे को बड़े होकर जो बनना है उसमें उसकी मदद की जाए।

खुशहाल जीवन के लिए जहाँ शांति है वहाँ विकास है, जहाँ विकास है वहाँ सुख है। मन जब स्थिर हो जाता है तो उस स्थिति को शांति कहते हैं । शांति मधुरता और भाईचारे की अवस्था है जिसमें कोई लड़ाई झगड़े, बैर भाव नहीं होते। शांति का अर्थ यह भी नहीं है कि केवल मुँह से चुप रहना बल्कि मन का चुप रहना ही सच्ची सुख शांति है कहते हैं कि जहाँ शांति है वहाँ सुख है। मनुष्य के पास धन दौलत, वैभव और सुख साधन है परंतु शांति नहीं है तो कुछ भी नहीं है यह सब कुछ खरीदे जा सकते हैं लेकिन शांति खरीद नहीं सकते हैं।
Usha Panwar
The Fabindia School, Bali
upr4fab@gmail.com

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